शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

सूरज (त्रिभंगी छंद)


जागृत परमात्मा, जग की आत्मा, ज्योति रूप में, रचे बसे ।
अंतरिक्ष शासक, निश्श विनाशक, दिनकर भास्कर, कहे जिसे ।।
अविचल पथ गामी, आभा स्वामी, जीवन लक्षण, नित्य रचे ।
जग जीवन दाता, सृष्टि विधाता, गतिवत शाश्वत, सूर्य जचे ।।

विज्ञानी कहते, सूरज रहते, सभी ग्रहों के, मध्य अड़े ।
सूर्य एक है तारा, हर ग्रह को प्यारा, जो सबको है, दीप्त करे ।।
नाभी पर जिनके, हिलियम मिलके, ऊर्जा गढ़कर, शक्ति भरे ।
जिसके ही बल पर, ग्रह के तम पर, अपनी आभा, नित्य करे ।।

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मौलिक अप्रकाशित

सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

अस्तित्व पीतल का भी होता है

मैं चाहता हूँ अपने जैसे ही होना
क्यों मढ़ते हो आदर्शो का सोना
अस्तित्व पीतल का भी होता है जग में
क्यों देख कर मुझको आता है रोना

रविवार, 1 अक्तूबर 2017

पल छिन सुख-दुख

मेरे मुँह पर जो कालिख लगा है, वह मेरा है नही
तेरे मुँह पर जो लाली दिखे है, वह तेरा है नही
यह तो दुनिया का दस्तूर है, हमसब हैं जानते
पल छिन सुख-दुख जग में हमेशा, अंधेरा है नही

बुधवार, 30 अगस्त 2017

बनें हर कोई दर्पण

दर्पण सुनता देखता, जग का केवल सत्य ।
आँख-कान से वह रहित, परखे है अमरत्व ।।
परखे है अमरत्व, सत्य को जो है माने ।
सत्य रूप भगवान, सत्य को ही जो जाने ।।
सुनलो कहे ‘रमेश‘, करें सच को सच अर्पण ।
आँख-कान मन खोल, बनें हर कोई दर्पण ।।

रविवार, 27 अगस्त 2017

नामी कामी संत

गुंडा को भाई कहे, पाखण्ड़ी को संत ।
करे पंथ के नाम पर, मानवता का अंत ।।
मानवता का अंत, करे होकर उन्मादी ।
नामी कामी संत, हुये भाई सा बादी ।।
अंधभक्त जब साथ, रहे होकर के मुंडा ।
पाखण्ड़ी वह संत, बने ना कैसे गुंडा ।।

शनिवार, 19 अगस्त 2017

राजनीति का खेल

बात-बात में जो करे, संविधान की बात ।
संविधान के मान को, देते क्यों हैं मात ।।

संविधान की सभा में, जिसने किया स्वीकार ।
राष्ट्रगीत का आज फिर, करते क्यों प्रतिकार ।।

हिन्द पाक दो खण्ड़ में, बांट चुके हैं देश ।
मुद्दा जीवित फिर वही, बचा रखे क्यो शेष ।।

छद्म धर्म निरपेक्ष है, राष्ट्रवाद भी छद्म ।
छद्म छद्म के द्वन्द से, उपजे पीड़ा पद्म ।।

हिन्दू मुस्लिम गांव में, रखते हैं हम मेल ।
लड़ा रहे वे खेलकर, राजनीति का खेल ।।