मंगलवार, 14 नवंबर 2017

आज की शिक्षा नीति

शिक्षा माध्यम ज्ञान का, नहीं स्वयं  यह ज्ञान ।
ज्ञान ललक की है उपज, धर्म मर्म विज्ञान ।।
धर्म मर्म विज्ञान, सरल करते जीवन पथ ।
शिक्षा आज व्यपार, चले कैसे जीवन रथ ।।
करे कैरियर खोज, आज फैशन में शिक्षा ।
मृत लगते संस्कार, आज मिलते जो शिक्षा ।।

-रमेश चौहान

बुधवार, 8 नवंबर 2017

ईश प्रार्थना

ईश्वर से कुछ मांगना, प्रश्न बनाता एक ।
जग व्यापक सर्वज्ञ है ? या हम किये कुटेक ??
(कुटेक=अनुचित मांग)

क्या मांगू प्रभु आप से, जब रहते हो साथ ।
चिंता मैं क्यों कर करूं, जो पकड़े हो हाथ ।।

मेरे अनभल बात को चित्त धरें ना नाथ ।
मेरा मन तो स्वार्थ में, करे बात अकराथ ।।

सुख में विस्मृत कर गया, दुख में रहा न आस ।
कसे कसौटी आप जब, भूल गया यह दास ।।

श्रद्धा अरु विश्वास के, लिये सुमन प्रभु हाथ ।
अर्पण करुँ मैं आपको, मुझको करें सनाथ ।।

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

सुबह-सुबह का सैर

सुबह-सुबह का सैर तो, औषध हैअनमोल ।
रक्तचाप अरु शर्करा, नियत रखें बेमोल ।।
नियत रखें बेमोल, देह के भारीपन को ।
काया दिखे सुडौल, रिझाये जो निज जन को ।
प्रतिदिन उठो "रमेश", नींद  तज सुबह-सुबह का ।
औषध है अनमोल,  सैर तो सुबह-सुबह का ।।
-रमेश चौहान

शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

शुभकामना

नित्य निरन्तर ध्येय पथ, पाद त्राण हो आपका ।
काव्य फलक के सूर्य सम, सम्य मान हो आपका ।।

बुद्धि प्रखर अरु स्वस्थ हो, राष्ट्र प्रेम पीयूष से ।
काया कल्पित स्वस्थ हो, मनोभाव सह तूष से ।।
(तूष-संतोष)

प्रेम जगत का प्राप्य हो, प्रेम सुवासित बाँट कर ।
शान्ति नित्य शाश्वत रहे, तन-मन पीड़ा छाँट कर ।।

सुयश अमर हो आपका, चेतन होवे लेखनी ।
वर्ण शब्द अरु भाव से,  व्यक्त काव्य हो पेखनी ।
(पेखनी-विशिष्ट तथ्य)

अपनों को भूले नहीं, मिट्टी रखें सम्हाल कर ।
चाहे हों धरती फलक, चाहे हों अट्टाल पर ।
-रमेश चौहान

दोहे-कानून और आदमी

कानून और आदमी, खेल रहे हैं खेल ।
कभी आदमी शीर्ष है, कभी शीर्ष है जेल ।।

कानून न्याय से बड़ा, दोनों में मतभेद ।
न्याय देखता रह गया, उन  पर उभरे छेद ।।

न्याय काल के गाल में, चढ़ा हुआ है भेट ।
आखेटक कानून है, दुर्बल जन आखेट ।।

केवल झूठे वाद में, फँसे पड़े कुछ लोग ।
कुछ अपराधी घूमकर, फाँके छप्पन भोग ।।

कानून और न्याय द्वै, नपे एक ही तौल ।
मोटी-मोटी पुस्तकें, उड़ा रही माखौल ।।

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

रखते क्यों नाखून (कुण्डलियां)

मानव होकर लोग क्यों, रखते  हैं नाखून ।
पशुता का परिचय जिसे, कहता है मजमून ।।
कहता है मजमून, बुद्धि जीवी है मानव ।
होते विचार शून्य, जानवर या फिर दानव ।।
चले भेड़ की चाल, लोग फैशन में खोकर ।
रखते हैं नाखून, लोग क्यों मानव होकर ।।

पहनावा (कुण्डलियां)

पहनावा ही बोलता, लोगों का व्यक्तित्व ।
वस्त्रों के हर तंतु में, है वैचारिक स्वरितत्व ।।
है वैचारिक स्वरितत्व, भेद मन का जो खोले ।
नग्न रहे जब सोच, देह का लज्जा बोले ।
फैशन का यह फेर, नग्नता का है लावा । 
आजादी के नाम, युवा पहने पहनावा ।।